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संजीव भदौरिया

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पूर्वोत्तर राज्यों में व्यतीत समय

केन्द्रीय विद्यालय संगठन में मेरा कार्यकाल ४ साल का रहा | वहाँ के कुछ अनुभव आपके साथ शेयर कर रहा हूँ |

आज अर्थात १५-मार्च-२०१० को मेरा अरुणाचल प्रदेश में ९१९ वां दिन है। मैंने अरुणाचल की सीमा में प्रथम बार प्रवेश ९ सितम्बर- २००७ को किया था। मुझे यहाँ केंद्रीय विद्यालय संगठन ने एक स्नातकोत्तर अध्यापक (संगणक विज्ञान) के रूप में चुनकर "केंद्रीय विद्यालय नेरिस्ट" में नियुक्त किया था।

केंद्रीय विद्यालय संगठन में मेरी नियुक्ति ५-सितम्बर-२००७ अर्थात शिक्षक दिवस के दिन हुई थी। अतः में इस दिन की अपनी नियुक्ति को अपना सम्मान मानता हूँ। इस दिन मुझे असम के कामाख्या स्थित केंद्रीय विद्यालय मालीगाव में उपस्थित होना था सो मैं ४-सितम्बर-२००७ को कामाख्या रेलवे मंडल पर उतर गया। विद्यालय मंडल के दायें छोर पर स्थित था सो मैं पैदल ही विद्यालय पहुँच गया। वहां के चौकीदार ने मुझे एक कमरे तक पहुचा कर कहा, "आप यहीं आराम करिए, कल सब व्यवस्था हो जायेगी। "

कमरे में प्रविष्ट होते ही मैंने देखा कि मेरे जैसे कई और साथी अलग अलग क्षेत्रों से एक दिन पहले ही पहुँच गए थे। सबके चहरे उदास थे। सबके चहरे पर प्रश्न वाचक चिन्ह था। मेरी भी स्तिथि कुछ कुछ प्रश्नवाचक थी पर मैं एक नए रोमांच से भरा हुआ था। लोगों ने मुझे चलाने से पहले बहुत डराया। अरे अरुणाचल में तो लोग काट देते हैं, वहां सांप और जोंक बहुत होती हैं। पूरा का पूरा जंगल है। वहां खली सेना रह सकती है इत्यादि। और साथियों से बात करने पर पता चला कि उन सबको भी ऐसे ही डराया गया था। एक दो तो एक दम रोने पर ही थे। अधिकाँश लोग वापस जाने कि इच्छुक थे। सत्य है अपना घर सबको अच्छा लगता है, परन्तु बना वही है जो घर और अपने शहर से बाहर निकला है। मेरी इस बात से सब सहमत थे। मैंने सबमे ढाढस बांधा और अपनी बात जारी रखी। हम बात करते रहे और सबके चहरे पर प्रसन्नता आती गयी। क्यों कि हम सब यही सोच रहे थे कि क्या हम यहाँ के लोगों के साथ, भाषा के साथ, वातावरण के साथ तालमेल बैठा पाएंगे। मैंने सभी से कहा कि जिस परिस्थिति में ओ प्रसन्ना रहो, मुश्किलें अपने आप कम हो जायेंगी। इस तरह आधी रात बीत गयी, और हम सब सामान्य हो गए। सबने प्रण लिया कि हम सब कठिनाइयों का सामना डट कर करेंगे।

हमने कामाख्या देवी के दर्शन भी किये। जोकि हमारे देश में एक महत्वपूर्ण स्थान रखतीं हैं। कामाख्या देवी का मंदिर एक शक्तिपीठ के रूप में जाना जाता है। असम आने से मेरा एक तीर्थ पूरा हो चुका है।

खैर हमारे ५ दिन असम में बहुत अच्छे कट गए। हमारे प्रतिस्थापना कार्यक्रम में हमारे सह-आयुक्त श्री खावारे, शिक्षा-अधिकारी श्री मुरली जी, श्री वर्मा जी एवं हमारे संसाधक महोदय श्री अनुतोष देब ने हमारे मन से भय निकाल दिया। ५ दिन तक कामाख्या में बारिश होती रही। ऐसा मौसम हमने पहली बार देखा था। कार्यक्रम का स्थान विद्यालय ही था सो हमारे खाने की और रहने कि व्यवस्था विद्यालय के द्वारा ही की गयी। हम उत्तर भारतीयों को चूंकि रोटी खाने की आदत है सो बहुत मुश्किल से ५ दिन चावल से गुज़ारा करना पड़ा। ये तो शुरुआत थी हम तो अपने गंतव्य स्थान की और से चिंतित थे कि वहां क्या क्या नसीब होगा।

अंतिम दिम सभी ने अपने स्थान के लिए जीप या बस पकड़ ली मैंने भी "नेटवर्क ट्रावेल्स" की बस में अपनी एक जगह सुनिश्चित कर ली। बस को आने में २ घंट थे सो मैं गुवाहाटी का थोडा मुआयना किया। मुझे बहुत अच्छा लगा। कुछ कुछ चटर-पटर भी खाया। और वापस जाकर प्रतीक्षा कक्ष में जाकर बस की प्रतीक्षा करने लगा। बैठा बैठा सोचने लगा। फिर मेरा ह्रदय तीव्र गाती से चलाने लगा और अरुणाचल का भय मन में समाने लगा। अब तो कोई पास में भी नहीं था जिससे बातें बाँट लेता।

मैं सोच रहा था कि वहाँ मेरी कोई बात समझेगा या नहीं। मैं आंग्ल भाषा के भरोसे था। मुझे ये भी भय था कि कही हिंदी भाषा का कहीं मुझे भुगतान न करना पड़ जाए, जैसा कि महाराष्ट्र में और असम में हो रहा है। इसके परे मुझे सांप और जोंक का भी भय था। मैंने पहले कभी जोंक नहीं देखी थीं। पर मैं रोमांचित था, क्यों कि डर में ही तो रोमांच होता है। रोमांच ताभ्हाई जब दिल जोर - जोर से हथौड़े की तरह बरस रहा हो। इतने में आवाज़ आयी "ईटानगर-ईटानगर"। मेरी बस आ गयी थी। मैं अपनी आरक्षित सीट पर बैठ गया और पुनः सोचने लगा। मुझे अपने घर इटावा और भोपाल में बिताये हर-एक पल याद आने लगे। मम्मी और पापा, बाबा और दादी, छोटी बहन का चेहरा सामने आने लगा। आँखे नाम हो गयी, लगा जैसे सब मुझे बुला रहे हैं। मन बहुत उदास हो गया। गले में भारी पन सा लगाने लगा। बस फूट-फूट कर रोना ही बाकी था कि बस चाल दी। ठंडी ठंडी हवा चहरे पर लगाने लगी। रत के समय गुवाहाटी शहर के बार के नज़ारे देखते देखते कब उदासी दूर हो गयी पता ही नहीं चला। शहर ख़त्म होते होते मुझे नींद आ गयी।

अचानक से आवाज़ आयी "खाना खाना हो तो खा लो" हालांकि ये शब्द असमियाँ भाषा में थे पर समझ में आगये। बार आकर देखा तो एक ढाबा था जहां सब लोग खाना खा रहे थे और कुछ प्रतीक्षा में था। थोड़ी देर मैं मैंने भी दाल-चावल का नया स्वाद लिया। मैं चावल कई बार खाया है पर इस तरह का नया स्वाद मुझे बहुत पसंद आया। खाना खाने के बाद वापस बस में आकर बैठ गया और फिर सोचने लगा .... कि कैसा होगा अरुणाचल प्रदेश, क्योंकि कि अरुणाचल कि सुर्खियाँ बहुत मुश्किल से समाचारों में आती थी। सो जानकारी बहुत कम थी। जितनी भी थी वो डराने के लिए काफी थी। खैर १/२ घंटे बाद बस चाल दी। इस समय रात के १ बज रहे थे। धीरे - धीरे फिर नींद आ गयी। सुबह-सुबह ५ बजे बस अरुणाचल की सीमा बन्दर-देवा द्वार पर पहुँच गया। आधी नींद में सहचालक की आवाज़ सुनायी दी "सब लोग चेकिंग के लिए नीचे आ जाओ"। मुझे बड़ा अजीब लगा क्योंकि आजतक मैं कभी इस परिस्थिति से नहीं गुजरा, पर नियम का पालन तो करना ही था। अरुणाचल सीमा में प्रवेश के लिए जिला-आयुक्त कि आज्ञा, अथवा कारण और पहचान पत्र अतिआवश्यक है अन्यथा सेना के जवान आपको द्वार पर ही रोक लेंगे, फिर आपको अन्दर जाने के लिए आज्ञा की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी।

मेरे साथ मेरा नियुक्ति पत्र था सो मुझे अनुमति मिल गयी। सारे यात्रियों के सामान का निरिक्षण कर एक-एक करके द्वार के अन्दर प्रवेश मिला। बाद में बस ने अन्दर आकर सारे यात्रियों को बैठाया और पुनः लक्ष्य कि और प्रस्थान कर दिया। मैंने चूंकि पहले ही सहचालक से पूंछ लिया था की नेरिस्ट कितनी देर से आयेगा। पता चलाने पर कि सिर्फ १/२ घंटे में ही पहुच जाऊंगा सो मैंने अपने सामान को संभाल लिया। १/२ घंटे के बाद आवाज़ आयी "नेरिस्ट", तो मैं बस के द्वार पर पहुच गया। बस से उतारा ही था कि बस चाल दी। सड़क पर मैं अकेला, पानी रिमझिम कर रहा था। सामने नेरिस्ट का बड़ा सा द्वार था, द्वार के दोनों और कुछ बंद दुकाने थीं। द्वार के अन्दर एक लम्बी सी सड़क जिसके दोनों और नाहर के ऊँचे-ऊँचे वृक्ष बहुत सुन्दर लग रहे थे। प्रांत सुबह के ६ बजे वहाँ कोई नहीं था, कदाचिद बारिश के कारण। पहाड़ों को देख कर मन भय -भीत था। सांप और जोंक का ख्याल उसमे और भरपाई कर रहा था। ज़मीन पर हर काली- छोटी लकीर को देख कर जोंक और सांप का भ्रम होता था सो चौंकना जायज़ था। मैं सड़क के दूसरी और था जिस और एक खेल का मैदान था जो एक बाड़ से घिरा हुआ था।

गुवाहाटी से चलाने से पहले मैं अपने विद्यालय में दूरभाष से बात कर ली थी। मुझे हमारे यहाँ के बड़े बाबू ने बता दिया था कि आपको "गेस्ट हाउस" पहुचना है। वहाँ हमारे विद्यालय के एक और शिक्षक पहले से ही हैं जो एक माह पहले वहाँ आये है। अतः मैंने द्वारपाल से "गेस्ट-हाउस" का पता पूंछा और चाल दिया। कुछ ही पल में मैं गेस्ट हाउस में था। मैंने वहाँ के संहालक से कमरे के बारे में पूंछा तो विद्यालय कि तरफ से पहले ही मेरे आने कि सूचना मिल गयी थी। उन्होंने मुझे हमारे विद्यालय के शिक्षक के पास पहुचा दिया।

चूंकि उस दिन रविवार था सो विद्यालय जाने का कोई सवाल नहीं था। उसी दिन फिर मैं अपने बाकी के साथियों से और अपने प्राचार्य महोदय से मिला। सभी बहुत सहायक थे। १-२ हफ़्तों तक बहुत अजीब लगा परन्तु फिर आदत पड़ गयी। विद्यालय के सारे कर्मचारी बहुत मस्त थे। एक- दो लोगों को छोड़ कर बाकी का स्टाफ एक परिवार की तरह रहते थे। खाने में सारा उत्तर भारतीय सामान उपलब्ध था। चूंकि नेरिस्ट में देश के हर कोने से लोग मौजूद हैं, सो हर प्रकार के त्यौहार हम मानते हैं। यहाँ भाषा की भी कोई समस्या नहीं हुई क्यों कि यहाँ जब आया तो पता चला कि यहाँ पर भी हिंदी ही बोली जाती है भले ही टूटी - फूटी हो पर हिंदी तो है। सो मैं अपने आपको खुश नसीब मानता हूँ कि मुझे केंद्रीय विद्यालय ने नेरिस्ट जैसी जगह पर और अरुणाचल प्रदेश में भेजा। यहाँ मैं तवांग जैसी जगह पर भी घूमा जिससे समस्त भारत के लोग कटे से रहते है। उन्हें यहाँ कि सुन्दरता के बारे में पता ही नहीं है।

मैं अपने भारत वासियों से ये अनुरोध करना चाहूंगा कि एक बार पूर्वोत्तर क्षेत्र में ज़रूर भ्रमण करें।